पेसा अधिनियम के अनुपालन पेसा अधिनियम के अनुपालन

विधान विधान

विधान

24 अप्रैल, 1993 से प्रभावी, संविधान (तिहत्तरवां संशोधन) अधिनियम, 1992, भारत के संविधान में नौवें भाग में सन्निविष्ट किया गया है और पंचायतों को ग्रामीण भारत के लिए स्थानीय स्व-शासन की संस्थाओं के रूप में एक संवैधानिक दर्जा प्रदान करता है।

संविधान का अनुच्छेद 243 ड (1), अनुच्छेद 244 के खंड (1) और (2) में निर्दिष्ट अनुसूचित क्षेत्रों और आदिवासी क्षेत्रों में संविधान के नौवें भाग के प्रावधानों को लागू करने से छूट देता है।  हालांकि, अनुच्छेद 243 ड (4) (ख) संसद को कानून बनाने और नौवें भाग के प्रावधानों को खंड  (1) में निर्दिष्ट अनुसूचित क्षेत्रों और आदिवासी क्षेत्रों में विस्तारित करने की शक्ति प्रदान करता है, बशर्ते कि ऐसे अपवादों और संशोधनों को ऐसे कानूनों में निर्दिष्ट किया गया हो और इस तरह का कोई भी कानून अनुच्छेद 368 के प्रयोजन के लिए संविधान का संशोधन नहीं माना जाएगा 

                                                              

भारत के अनुसूचित क्षेत्रों में आदिवासी बहुल आबादी है, जो प्राचीन रीति-रिवाजों और प्रथाओं की एक सुव्यवस्थित प्रणाली के माध्यम से अपने प्राकृतिक संसाधनों के प्रबंधन करते हैं और अपने निवास स्थान में सामाजिक, आर्थिक और राजनीतिक जीवन को संचालित करते हैं।इस अभूतपूर्व सामाजिक परिवर्तन के युग में, इस चुनौती का सामना करने के लिए आदिवासियों की सांस्कृतिक पहचान और सामाजिक-आर्थिक परिवेश को छेड़े या नष्ट किए बिना उन्हें विकास के प्रयासों की मुख्य धारा में शामिल करने की अनिवार्य आवश्यकता महसूस की गई।

 

संविधान की पांचवीं अनुसूची अनुसूचित क्षेत्रों तथा असम, मेघालय, त्रिपुरा और मिजोरम के अलावा अन्य किसी भी राज्य में रहने वाली अनुसूचित जनजातियों के प्रशासन और नियंत्रण से संबंधित है ।

 

भूरिया समिति

 

इस उद्देश्य की प्राप्ति के लिए, सरकार ने आदिवासियों के लिए स्व-शासन के विभिन्न आयामों, संवैधानिक आवश्यकताओं की जांच करने और संविधान के नौवें भाग के प्रावधानों को अनुसूचित क्षेत्रों में विस्तार देने हेतु सिफारिशें करने के लिए 1994 में श्री दिलीप सिंह भूरिया की अध्यक्षता में एक समिति गठित की, जिसे "भूरिया समिति" कहा जाता है। भूरिया समिति की महत्वपूर्ण सिफारिशों में अन्य बातों के साथ निम्नलिखित शामिल हैं:

  1. योजनाओं को बहुत ही अच्छी तरह से विशेष रूप से जमीनी स्तर और जिला स्तर पर सहभागितापूर्ण लोकतंत्र से संबंधित होना चाहिए।
  2. ग्राम सभा को पुरवा/ग्राम स्तर पर भूमि, वन, जल और वायु प्रबंधन जैसे पारंपरिक कार्यों को करना चाहिए।
  3. जातीय जनसांख्यिकी और भौगोलिक आधार पर राज्य की सीमाओं के पुनर्गठन पर विचार करना चाहिए।
  4. आदिवासी क्षेत्रों को उप राज्य का दर्जा दिए जाने पर जनजातीय आकांक्षाओं को संतुष्ट किया जा सकता है। भारत की केंद्रीय आदिवासी पट्टियों में जिलों को स्वायत्त जिला परिषद का दर्जा देने का कार्य उप-संघवाद की प्रकृति में किया जाएगा।
  5. भूमि अधिग्रहण कानून की बुनियादी कमियों को हटाया जाए। स्थानीय ग्राम समुदाय की सहमति अनिवार्य होनी चाहिए। पुनर्वास संकुल को स्थानीय गॉंव समुदाय की सहमति से संचालित किया जाना चाहिए। प्रभावित परिवारों को पुनर्वास के एक साधन के रूप में आजीविका के व्यवहार्य और स्वीकार्य संकुल की पेशकश की जानी चाहिए।
  6. स्वायत्त जिलों में तैनात विभागों के कर्मचारियों/सरकारी पदाधिकारियों को जिला परिषदों के नियंत्रण में रखा जाना चाहिए।
  7. आर्थिक संसाधनों को आदिवासी समुदाय की देखरेख में माना जाना चाहिए। जिलों और अन्य परिषदों को उद्योगों के लिए भूमि के नियमन और अन्य संसाधनों के लिए उचित कानून बनाने चाहिए।

पेसा, 1996

 

1995 में प्रस्तुत, भूरिया समिति की रिपोर्ट के आधार पर, संसद ने प्रति संविधान के अनुच्छेद 243 ड में निर्दिष्ट पांचवीं अनुसूची क्षेत्रों में इसकी प्रयोज्यता के लिए पंचायत (अनुसूचित क्षेत्रों के लिए विस्तार) (पेसा) अधिनियम, 1996 के प्रावधान लागू किया।

 

 

पेसा अधिनियम की मुख्य विशेषताएं

  • प्रत्येक गांव में अपनी ग्राम सभा होगी।  एक गांव में एक समुदाय के एक या अधिक बस्तियां या पुरवे शामिल हो सकते हैं, जो परंपराओं और रीति-रिवाजों के अनुसार अपने मामलों के प्रबंधन करता हो [धारा 4 (ख) और धारा 4 (ग)]।

 

  • ग्राम सभा इनकी रक्षा और संरक्षा करने के लिए "सक्षम" है

 

क) लोगों की परंपराएं और रीति-रिवाज, और उनकी सांस्कृतिक पहचान,

ख) समुदाय के संसाधन, और

ग) विवाद समाधान का परंपरागत तरीका [धारा 4 ()]

 

  • ग्राम सभा के निम्नलिखित अनिवार्य कार्यकारी कार्य होंगे
  • सामाजिक और आर्थिक विकास के लिए योजनाओं, कार्यक्रमों और परियोजनाओं को मंजूरी देना      [धारा 4 (ड.) (i)]
  •            गरीबी उन्मूलन और अन्य कार्यक्रमों के अंतर्गत लाभार्थियों के रूप में व्यक्तियों की पहचान   [घारा 4 (ड.) (ii)]
  •            पंचायत द्वारा ऊपर खंड (ड.) में उल्लिखित योजनाओं; कार्यक्रमों और परियोजनाओं के लिए धन के उपयोग का एक प्रमाण पत्र जारी करना   [धारा 4 (च)]

 

  • उचित स्तर पर ग्राम सभा/पंचायत के लिए विशेष शक्तियां

 

i)   भूमि अधिग्रहण, पुनर्वास और विस्थापित व्यक्तियों के पुनर्वास में अनिवार्य परामर्श का अधिकार        [धारा 4 ()]

 

ii)   एक उचित स्तर पर पंचायत को लघु जल निकायों की योजना और प्रबंधन का कार्य सौंपा गया है  [धारा 4 ()]

 

iii)   एक उचित स्तर की ग्राम सभा या पंचायत द्वारा द्वारा खान और खनिजों के लिए संभावित लाइसेंस/पट्टा, रियायतें देने के लिए अनिवार्य सिफारिशें  [ धारा 4 (ट), (1)]

 

 

  • उचित स्तर पर ग्राम सभा और पंचायत को सौंपी गई शक्तियां

 

  1. मादक द्रव्यों की बिक्री/सेवन को विनियमित करना  धारा  4 () (i)]                        

 

  1. लघु वनोपजों का स्वामित्व      धारा 4 ()(v)]

 

  1. भूमि हस्तान्तरण को रोकना और हस्तांतरित भूमि को बहाल करना    धारा 4() (iii)]

 

  1. ग्रामीण हाटों का प्रबंधन     [धारा4 () (iv)]

 

  1. अनुसूचित जन जातियों के लिए महाजनी पर नियंत्रण    [धारा4 () v)]

 

  1. सामाजिक क्षेत्र में कार्यकर्ताओं और संस्थाओं, जनजातीय उप योजना और संसाधनों सहित स्थानीय योजनाओं पर नियंत्रण                 [धारा 4 () (vi)(vii)]